दादी कहती थीं…

दादी की यादे...

मेरी दादी कहती थीं…

एक ऐसी स्मृति, जो आज भी जीवन का मार्ग दिखाती है

बचपन की कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं, जो समय के साथ धुँधली न होकर उम्र बढ़ने के साथ और गहरी होती जाती हैं। मेरी दादी से जुड़ी ऐसी ही अनगिनत स्मृतियाँ आज भी मेरे मन के किसी कोने में सुरक्षित हैं।

हमारी सुबह दादी के भजनों से होती थी। उनकी मधुर आवाज़ में जब भक्ति के स्वर आँगन में गूँजते, तो लगता जैसे पूरा घर ही किसी मंदिर में बदल गया हो। उस समय शायद हम बच्चों को उन भजनों का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आता था, लेकिन आज महसूस होता है कि उन स्वरों के साथ दादी हमारे भीतर संस्कार भी उतार रही थीं।

दादी की एक खास आदत थी—हर बात को समझाने के लिए वे कोई न कोई कहावत या दोहा जरूर सुनाती थीं।

कभी हमें बड़ों का सम्मान करना सिखातीं, कभी मीठा बोलने की सीख देतीं और कभी मेहनत तथा धैर्य का महत्व समझातीं। उनकी बातें उस समय कभी-कभी साधारण लगती थीं, लेकिन जीवन के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए समझ आया कि उन छोटी-छोटी बातों में कितना बड़ा जीवन-दर्शन छिपा था।

वे अक्सर कहती थीं—

“बेटी, शब्द सोच-समझकर बोलना, क्योंकि निकला हुआ शब्द और छोड़ा हुआ तीर वापस नहीं आता।”

और! फिर किसी दोहे के माध्यम से अपनी बात को और गहराई दे देतीं। उनकी सीख में किताबों का ज्ञान कम और जीवन का अनुभव अधिक होता था।

दादी ने हमें केवल संस्कारों की बातें नहीं बताईं, बल्कि अपने व्यवहार से उन्हें जीना भी सिखाया। बड़ों का आदर करना, छोटों से स्नेह रखना, घर आए व्यक्ति का सम्मान करना, जरूरतमंद की मदद करना और परिस्थितियाँ कैसी भी हों, अपनी मर्यादा बनाए रखना—ये सब बातें धीरे-धीरे हमारे जीवन का हिस्सा बनती चली गईं।

मैं जब किशोर अवस्था में आई तो, साउथ इंडियन ड्रेस जैसे हाफ सारी, पहनने लगी, उसे कभी डाँट कर नहीं बताना पड़ा, क्यों कि वो कभी किसी का उदाहरण देकर बताती, और कहती आज लहंगा, चुन्नी पहनेंगी, तो कल को साडी पहनने में परेशानी नही होगी। बहुत दूर की सोचती थीं।

आज जब मैं अपने ससुराल में हूँ और वहाँ मुझे जो मान-सम्मान और अपनापन मिलता है, तो मन अनायास ही दादी को याद करता है। लगता है, मेरे साथ दादी की दी हुई वह अनमोल विरासत भी आई है। उन्होंने जो संस्कार बचपन में मेरे मन में रोपे थे, वही आज मेरे व्यवहार में दिखाई देते हैं।

अब समझ आता है कि दादी हमें केवल कहावतें और दोहे नहीं सुनाती थीं, वे तो जीवन जीने की कला सिखाती थीं।

उनकी सुबह की प्रार्थना, उनके भजनों की मिठास, उनकी सीख भरी बातें और उनका स्नेह—सब आज भी मेरे भीतर जीवित है।

दादी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ जैसे आज भी कानों में सुनाई देती है—

“बेटी, जीवन में कितना भी आगे बढ़ जाना, लेकिन अपने संस्कारों को कभी पीछे मत छोड़ना।”

सचमुच, कुछ लोग हमारे साथ थोड़े समय के लिए रहते हैं, लेकिन उनकी सीख पूरी उम्र हमारा हाथ थामे रहती है।

मेरी दादी भी मेरे जीवन की ऐसी ही अनमोल विरासत हैं।

उनके दिए संस्कार ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी हैं,

और आज भी उनकी स्मृतियाँ मेरे जीवन की राह रोशन करती हैं। 🙏🌹



— प्रमिला त्रिवेदी

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