प्रथम संस्मरण
प्रभु जगन्नाथ के प्रेम, विश्वास और कृपा का संस्मरण
भूमिका
जीवन की यात्रा में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो समय बीत जाने पर भी मन के आँगन में दीपक की तरह जलती रहती हैं। वे केवल स्मृतियाँ नहीं होतीं, बल्कि ईश्वर की कृपा, जीवन के सत्य और आत्मानुभूति के जीवंत दस्तावेज बन जाती हैं। ऐसे अनुभवों को जब शब्दों का रूप मिलता है, तब वे संस्मरण बन जाते हैं।
संस्मरण लिखना केवल घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन नहीं है, बल्कि उन क्षणों में अनुभव किए गए भावों, विश्वास, आश्चर्य, सीख और आत्मसंवाद को पाठकों तक पहुँचाने की एक सजीव कला है। एक सच्चा संस्मरण पाठक को केवल घटना नहीं सुनाता, बल्कि उसे उस पल का सहभागी बना देता है। यही कारण है कि श्रेष्ठ संस्मरण पढ़ते-पढ़ते मन में अपने जीवन के अनगिनत भूले-बिसरे अनुभव जाग उठते हैं और स्वयं उन्हें शब्दों में सँजोने की प्रेरणा मिलने लगती है।
प्रस्तुत संस्मरण भी ऐसी ही एक सहज, सरल और हृदयस्पर्शी अनुभूति का साक्षी है, जिसमें भगवान जगन्नाथ की अद्भुत लीला, भक्त की भावनाएँ और ईश्वर की प्रेमपूर्ण व्यवस्था अत्यंत स्वाभाविक रूप में अभिव्यक्त हुई है। इसे पढ़ते हुए सहज ही अनुभव होता है कि मनुष्य योजनाएँ बनाता है, किन्तु जीवन की दिशा अंततः उसी परम सत्ता के हाथों में होती है।
संस्मरण
प्रेम, विश्वास और जगन्नाथ कृपा का संस्मरण
प्रमिला त्रिवेदी
एक बार मैं अपने पति के साथ भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए पुरी गई थी। हम कुल दस लोग थे। मंदिर के पास ही एक होटल में ठहरे। हमारे परिचित पंडा जी का फोन नंबर पहले से हमारे पास था। वे स्वयं हमें लेने आ गए।
हम लोग भुवनेश्वर से आए थे। वहाँ दो दिन दर्शन करने के बाद पुरी पहुँचे थे। भुवनेश्वर से पुरी का रास्ता लगभग एक घंटे का है। हम शाम लगभग सात बजे पहुँचे। पंडा जी ने कहा, "अभी भीड़ कम है, पहले एक बार भगवान के दर्शन कर लीजिए। कल स्पर्श दर्शन करवा दूँगा।"
हम सभी उनके साथ मंदिर गए। बड़ी शांति से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के दर्शन हुए। मन तृप्त हो गया। दर्शन करके हम होटल लौट आए और विश्राम किया।
अगले दिन स्पर्श दर्शन के लिए गए तो मंदिर में इतनी भीड़ थी कि कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। श्रद्धालु एक-दूसरे को धक्का देते हुए आगे बढ़ रहे थे। यदि कोई गिर जाए तो उसे उठाने का भी अवसर नहीं मिलता, लोग उसे कुचलते हुए आगे निकल जाते। यह दृश्य देखकर मैं बहुत घबरा गई।
उसी समय मैंने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की— "हे प्रभु! इस बार तो आपके दर्शन हो गए। अब आपकी यह दिव्य छवि अपनी आँखों में बसाकर ले जाऊँगी और जीवन भर मानसिक दर्शन ही करती रहूँगी। अब कभी पुरी नहीं आऊँगी।"
लेकिन भगवान की लीला तो कुछ और ही थी।
कुछ समय बाद मेरे बेटे की नौकरी का स्थानांतरण भुवनेश्वर हो गया। अब पुरी जाना तो जैसे सहज ही हो गया। फिर मेरी दो बहनें मिलने आईं, उन्हें भी जगन्नाथ जी के दर्शन कराने जाना पड़ा। उसके बाद भाई आया, वह भी आग्रह करके साथ ले गया। फिर जब भी कोई मेहमान आता, हम उसे भगवान जगन्नाथ के दर्शन अवश्य कराने जाते।
जब तीसरी बार मंदिर पहुँची, तभी अचानक मुझे अपनी कही हुई बात याद आ गई। मंदिर में ही मैंने कान पकड़कर भगवान से क्षमा माँगी और कहा—"प्रभु! मुझसे भूल हो गई। आपकी इच्छा के आगे मेरी इच्छा का क्या मूल्य?"
तब मुझे लगा कि भगवान ने मेरी भूल की कितनी प्यारी "सजा" दी। जिस प्रभु से मैंने कहा था कि अब कभी नहीं आऊँगी, उसी प्रभु ने एक ही वर्ष में पाँच बार अपने श्रीचरणों के दर्शन करा दिए। फिर एक वर्ष बाद मेरे बेटे का स्थानांतरण वापस हैदराबाद हो गया।
आज जब भी उस घटना को याद करती हूँ, मन श्रद्धा से भर उठता है। सच ही तो है—भगवान अपने भक्त की हर बात सुनते हैं, पर करते वही हैं जिसमें भक्त का कल्याण और अपनी प्रेममयी लीला छिपी होती है।




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