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Showing posts from September, 2026

पर्यटन और पर्यटक

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पर्यटन दिवस पर विशेष पर्यटन और पर्यटक यात्रा स्थान बदलना नहीं, दृष्टिकोण बदलना है जब मन उदास हो और सामने हरी-भरी वादियों का साथ मिल जाए, तो सारे एहसास कुछ खास हो जाते हैं। अनजान रास्तों पर अपनी ख्वाहिशों के साथ जब हम सफर करते हैं, तो कहीं-कहीं ऐसे नजारे सामने आ जाते हैं कि आँखें उन्हें देखती ही रह जाती हैं। हम उन पलों को आँखों के रास्ते दिल के कैमरे में कैद कर लेना चाहते हैं। कभी एक तस्वीर के लिए कैमरे का क्लिक जरूरी होता है, तो कभी कोई दृश्य बिना तस्वीर के ही मन में हमेशा के लिए बस जाता है। खूबसूरत नजारे देखकर दिल का मौसम अंगड़ाई लेने लगता है और भीतर से आवाज आती है— “यूँ ही चला चल राही, यूँ ही चला चल राही, कितनी हसीन है ये दुनिया...” जब हम चलने लगते हैं, तो लगता है जैसे रास्ते भी हमारे साथ-साथ चल रहे हों। किसी की तलाश में हों या अवकाश पर, कारोबार के सिलसिले में यात्रा कर रहे हों या परिवार के साथ समय बिताने के लिए—किसी न किसी रूप में यात्रा हम सबके जीवन का हिस्सा है। यात्रा को सुंदर और यादगार बनाते हैं हमारे साथ चलने वाले लोग, यात्रा का उद्देश्य, रास्तों के अनुभव और गंतव्य तक पहुँचने स...

गणेश उत्सव पर मची धूम... ‘नऊवारी साड़ी’ की!

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  गणेश उत्सव पर मची धूम... ‘नऊवारी साड़ी’ की! भूमिका हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है। यहाँ की संस्कृति, वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन, बोलियों और विचारों में भिन्नता दिखाई देती है; फिर भी हमारे त्योहार हमें एक सूत्र में बाँधने का कार्य करते हैं। भारत के प्रत्येक प्रांत की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है, जो वहाँ के पर्वों, परंपराओं, पहनावे और सामाजिक जीवन में सहज रूप से अभिव्यक्त होती है। इन्हीं विशिष्ट परंपराओं में महाराष्ट्र का गणेश उत्सव विशेष स्थान रखता है। गणेश उत्सव के आगमन के साथ ही महाराष्ट्र में उत्साह और उमंग का वातावरण बन जाता है। दस दिनों तक चलने वाला यह पर्व विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता भगवान गणेश को समर्पित होता है। श्रद्धालु अपनी-अपनी आस्था, परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार गणपति की आराधना करते हैं तथा उनके स्वागत और पूजन को विशेष बनाने का प्रयास करते हैं। भारतीय आस्था में यह विश्वास गहराई से जुड़ा है कि जब मनुष्य निर्मल भाव से ईश्वर के समक्ष समर्पित होता है, तो उसकी प्रार्थना को आशीर्वाद का स्पर्श मिलता है। इसी भाव के साथ भक्त अपने आराध्य के दर्शन और पूजन के लिए स्वच्छता, साद...

मेरे घर का गणेश उत्सव

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मेरे घर का गणेश उत्सव एक आत्मीय संस्मरण हर वर्ष गणेश चतुर्थी का आगमन मेरे लिए केवल एक त्योहार का आना नहीं होता, बल्कि ऐसा लगता है जैसे घर में स्वयं रिद्धि-सिद्धि के दाता, सद्बुद्धि देने वाले, शिव-पार्वती के दुलारे गणपति बप्पा पधार रहे हों। गणेश चतुर्थी के कुछ दिन पहले से ही घर में उत्सव की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। घर की साफ-सफाई, सजावट और पूजा की तैयारियों के बीच मन में एक अलग ही उत्साह जाग उठता है। हर वर्ष मन यही सोचता है कि इस बार बप्पा की झाँकी किस नए रूप में सजाई जाए। हमारे घर में गणेश उत्सव बड़े ही प्रेम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बप्पा के आगमन के दिन घर का वातावरण देखते ही बनता है। ऐसा लगता है जैसे खुशियाँ स्वयं हमारे आँगन में उतर आई हों। गणपति बप्पा की सुंदर प्रतिमा को जब हम श्रद्धापूर्वक घर में विराजमान करते हैं, तो मन अपने आप भक्ति से भर जाता है। पूजा के समय दीपक की लौ, फूलों की सुगंध और गणपति बप्पा के जयकारों से पूरा वातावरण पावन हो उठता है। परिवार के सभी लोग मिलकर आरती करते हैं। बप्पा के सामने हाथ जोड़कर मन की बात कहने का वह क्षण मेरे लिए बहुत खास होता है। मेरे लिए ...

दादी कहती थीं…

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दादी की यादे... मेरी दादी कहती थीं… एक ऐसी स्मृति, जो आज भी जीवन का मार्ग दिखाती है बचपन की कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं, जो समय के साथ धुँधली न होकर उम्र बढ़ने के साथ और गहरी होती जाती हैं। मेरी दादी से जुड़ी ऐसी ही अनगिनत स्मृतियाँ आज भी मेरे मन के किसी कोने में सुरक्षित हैं। हमारी सुबह दादी के भजनों से होती थी। उनकी मधुर आवाज़ में जब भक्ति के स्वर आँगन में गूँजते, तो लगता जैसे पूरा घर ही किसी मंदिर में बदल गया हो। उस समय शायद हम बच्चों को उन भजनों का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं आता था, लेकिन आज महसूस होता है कि उन स्वरों के साथ दादी हमारे भीतर संस्कार भी उतार रही थीं। दादी की एक खास आदत थी—हर बात को समझाने के लिए वे कोई न कोई कहावत या दोहा जरूर सुनाती थीं। कभी हमें बड़ों का सम्मान करना सिखातीं, कभी मीठा बोलने की सीख देतीं और कभी मेहनत तथा धैर्य का महत्व समझातीं। उनकी बातें उस समय कभी-कभी साधारण लगती थीं, लेकिन जीवन के रास्ते पर आगे बढ़ते हुए समझ आया कि उन छोटी-छोटी बातों में कितना बड़ा जीवन-दर्शन छिपा था। वे अक्सर कहती थीं— “बेटी, शब्द सोच-समझकर बोलना, क्योंकि निकला हुआ शब्द और छोड़ा हुआ त...